Friday, 26 June 2026

आंसू

 



मेरे पास भी होते आंसू तो मैं भी रो लेता,

अपने गहरे जख्मों को खारे पानी से धो लेता।


सूखे हुए कांच के कटोरों में पानी का रेशा भी नहीं मिलता ,

जब भी टटोलता हूं ज़ख्म हरा-सा है मिलता ।


किसी किस्मत वाले के गालों पर बहते हैं आंसू,

यहाँ तो अंदर ही अंदर दरिया-सा है बहता।


आता नहीं हर किसी को रोने का हुनर,

ये हुनर भी किसी-किसी को है मिलता।


किसी के आंसू से किसी को ठंडक मिलती होगी,

मेरे आंसुओं के बहने से कोई जलता सा है मिलता।


अक्सर लोग बहा देते हैं आंसुओं में बेचैनी,

मेरे आंसू गर बह जाएं, बेचैन - सा है मिलता।


तेरी बेचैनी बहती तो कुछ हल्का तो होगा,

मेरी बेचैनी न बहे तो चैन सा है मिलता।


कीमत ही क्या होगी इस खारे पानी की यारों,

दरिया में हो तो पूछे, समन्दर में कौन पूछता





हेमंत चौहान "वत्स "






किसी सितम पर बह जाए तो बेईमानी सी होगी।

Thursday, 23 April 2026

तुम कहां थी अब तक



कई बार खुद से सवाल करता हूं,

तुम मिलती हो - तो , पूछता हूं तुमसे

  अब तक तुम कहां थी !

कैसी अनोखी छवि,

प्रेमातुर कामिनी, मेरे हृदय की अरि,

जाने किस गति में व्योम थी !

दूर रहती हो तो,

हृदय में क्रोध - स्थापित

ढिंग से मोह व्यवस्थित, मन अव्यवस्थित,

रहता है।

अंजान थी!

कभी बहुत खुश , तो 

कभी उदास रहता हूँ।

तुम मिलती हो, तो 

पूछता हूं, मैं

तुमसे क्यों प्यार करता हूं,

कैसा अनोखा गठबंधन,

इतनी बेढ़ंगी, बेपरवाह

अपार सादगी, प्यार अथाह,

हृदय शांत - गोह 

चंचल आंखों से बात करता हूं।

देह को चमकाने में ,

मन को मैला कर रहा

क्या मैं प्रताड़ित कर रहा !

कई बार खुद से 

सवाल करता हूं -

मन का मोल न जानू

नित नए अपराध करता हूं।

सोचता हूं,

कुछ छुपा तो नहीं,

अंधेरे में प्रश्न -

प्रश्न पर प्रश्न करता हूँ।

मुस्कुराती हो होठों से

देखती हो आंखों से

एक सवाल मेरे अंदर भी टटोलती हो

छोड़ती हो - अपना भी आंखों से

नहीं - सब शांत

अतीत बातें करते हैं आपस में,

गहराई में,

तुम्हारी तलाश में भटकी थी -

अब टकराई हूं परछाईं से,

अतीत से ग्लानि से,

तुम्हारे प्रश्न से देह से

मैं फिर सवाल कई बार करता हूं

करता हूं खुद से खुदा से 

अंजान शक्स से ,

ईमान और ईशान से

मेरे जीवन का पूरब,

तुम कहां थी अब तक !

तुम अब तक कहाँ थीं


                                                                                  

डॉ हेमंत चौहान "वत्स"


Wednesday, 8 April 2026

समय और मैं

 समय ने मुझे जन्म दिया,

समय ही मुझे मारेगा 

फिर भी साथ नहीं चलते


समय और मैं।


परिस्थितियों को लाता है,

खींचकर, मुझसे मिलवाता है,

फंसाता है ,रुलाता है,

सुलझाता है,हंसाता है,

कभी वो आगे निकलता है कभी मैं,


साथ साथ नहीं चल पाते,

लड़ते और झगड़ते हैं,

पता नहीं किस राह से जाता है ,

हर बार नई होती है,

कभी मुस्कुराता हूं कभी कोसता हूं मैं,


अब क्या जिक्र करूं,समय की करतूतों का

कभी कभी तो खुद से ही नहीं मिल पाता हूं मैं,

समय से ही समय लेता हूं, खुद से मिलने का,

कुछ समय में ही समय हो जाता है,

और समय मुझे अधूरा छोड़ जाता है।

ये समय भी जाने कहां से आया,

 जाने, कब तक रहेगा।


मेरा समय खराब नहीं होता,

और अच्छा भी नहीं,

आवारा भी नहीं होता और व्यस्त भी नहीं,

मेरा समय भूखा भी नहीं होता ,

ओर अफरा भी नहीं,

मेरा समय मेरा नहीं होता और पराया भी नहीं,

मैं तो बस इसको देखता हूं,

और ये मुझे चलाता है।



डॉ हेमंत चौहान "वत्स"


Thursday, 26 February 2026

फिर वही सब......


चलो छोड़ दें मिलना जुलना कुटुंब का विस्तार हो चुका है,


स्वप्न था जो स्पर्श का, आलिंगन का, मिलन का, साकार हो चुका है,

गर्भ के प्रेम का, प्रसव की वेदना का, किलकारी के आंगन का,

समय अब निकल चुका है।

चलो अब छोड़ दें स्वप्न की अल्हड़ रेलगाड़ी को

मस्तिष्क में अभिभावक का विकास हो चुका है।

स्वप्न है भविष्य की शिक्षा का, दीक्षा का, व्यवसाय का,

अग्रिम जिम्मेदारियों का एहसास हो चुका है।

चलो अब छोड़ दें बालों को रंगना, चेहरों उम्र का निशान पड़ चुका है।

स्वप्न होगा अधूरे स्वप्न पूरे होते देखने का, 

नई  पहचान बनने का, नया कुटुंब बनने का,

नई किलकारी के नए आंगन का, 

फिर वही सब........

चलो अब छोड़ दें जीवन की आस लगाए रखना,

अंतिम और निश्चित पड़ाव आ गया है।

ये कोई निराशा नहीं ये कोई आशा भी नहीं,

ये जीवन नहीं और मरण भी नहीं,

चलो अब छोड़ दे समय से लड़ना,

पड़ाव बदलने का समय आ गया है।





हेमंत चौहान ' वत्स '


Monday, 9 February 2026

सुकूँ


फूलों पर चल कर ज़ख्म खाए हैं मेरे पैरों ने, 

कांटों का ज़िक्र होता तो सुकूँ होता।

अपनों से सिलवा कर लाए हैं दिल के टुकड़ों को, 

गैरों का ज़िक्र होता तो सुकूँ होता ।

क्या मालूम था तकदीर मेरे ही लफ़्ज़ लाएगी ज़िंदगी में,

किसी और का कहा होता तो सुकूँ होता।

मिला तो वही जो मांगा था तस्वीर की सीरत में,

इस चांद में दाग़ न होता तो सुकूँ होता।

हर रोज़ अपने ही गरेबां से जार जार लड़ती है तकदीर मेरी,

ये ग़रेबाँ किसी ग़ैर का होता तो सुकूँ होता।

फूलों में चल कर भी हर वक्त हंसते हैं नंगे पैर मेरे,

ये आंसू भी किसी ग़ैर का होता तो सुकूँ होता।

इतनी खामोशी से निकलती हैं आहें लबों से मेरे,

इन आहों में ज़िक्र किसी ग़ैर का होता तो सुकूँ होता।

दबा कर चल रहा हूं दर्द का गहरा दरिया सीने में,

इस दर्द में ज़िक्र किसी ग़ैर का होता तो सुकूँ होता।



  हेमंत चौहान "वत्स"


Monday, 5 January 2026

नारी - निराकारी


 नर से न कर होड़ नारी,

नर से ही होती है नारी।


नर से हितों बीज पनपता,

इस जग में तेरी है क्यारी,

कितनी भी कोई आग लगाता,

फिर भी है नर ही की प्यारी।


नर से न कर........


नर में जो दिखती है शक्ति, 

वो भी तो एक रूप है नारी,

नारायण की होती भक्ति,

वो भी तो एक रूप है नारी।


नर से न कर...........


जीवन के इस चक्रव्यूह की,

कुंजी भी होती है नारी,

जीवन के हर वन - कानन की,

हर बगिया की तू है फुलवारी।


नर से न कर..........


कितना विकट समय है जग में,

नर - नारी की होड़ है जग में,

जबकि घोर अंधकार से जग में,

इनकी ही पहचान है जग में।


नर से न कर ............


इनकी इन सब होड़ हाड़ में ,

श्रृष्टि के हैं नियम बदलते,

सब प्रलय की बेदी चढ़ते,

ये दोनों ही कारण बनते।



हेमंत चौहान "वत्स "