Thursday, 26 February 2026

फिर वही सब......


चलो छोड़ दें मिलना जुलना कुटुंब का विस्तार हो चुका है,


स्वप्न था जो स्पर्श का, आलिंगन का, मिलन का, साकार हो चुका है,

गर्भ के प्रेम का, प्रसव की वेदना का, किलकारी के आंगन का,

समय अब निकल चुका है।

चलो अब छोड़ दें स्वप्न की अल्हड़ रेलगाड़ी को

मस्तिष्क में अभिभावक का विकास हो चुका है।

स्वप्न है भविष्य की शिक्षा का, दीक्षा का, व्यवसाय का,

अग्रिम जिम्मेदारियों का एहसास हो चुका है।

चलो अब छोड़ दें बालों को रंगना, चेहरों उम्र का निशान पड़ चुका है।

स्वप्न होगा अधूरे स्वप्न पूरे होते देखने का, 

नई  पहचान बनने का, नया कुटुंब बनने का,

नई किलकारी के नए आंगन का, 

फिर वही सब........

चलो अब छोड़ दें जीवन की आस लगाए रखना,

अंतिम और निश्चित पड़ाव आ गया है।

ये कोई निराशा नहीं ये कोई आशा भी नहीं,

ये जीवन नहीं और मरण भी नहीं,

चलो अब छोड़ दे समय से लड़ना,

पड़ाव बदलने का समय आ गया है।





हेमंत चौहान ' वत्स '


Monday, 9 February 2026

सुकूँ


फूलों पर चल कर ज़ख्म खाए हैं मेरे पैरों ने, 

कांटों का ज़िक्र होता तो सुकूँ होता।

अपनों से सिलवा कर लाए हैं दिल के टुकड़ों को, 

गैरों का ज़िक्र होता तो सुकूँ होता ।

क्या मालूम था तकदीर मेरे ही लफ़्ज़ लाएगी ज़िंदगी में,

किसी और का कहा होता तो सुकूँ होता।

मिला तो वही जो मांगा था तस्वीर की सीरत में,

इस चांद में दाग़ न होता तो सुकूँ होता।

हर रोज़ अपने ही गरेबां से जार जार लड़ती है तकदीर मेरी,

ये ग़रेबाँ किसी ग़ैर का होता तो सुकूँ होता।

फूलों में चल कर भी हर वक्त हंसते हैं नंगे पैर मेरे,

ये आंसू भी किसी ग़ैर का होता तो सुकूँ होता।

इतनी खामोशी से निकलती हैं आहें लबों से मेरे,

इन आहों में ज़िक्र किसी ग़ैर का होता तो सुकूँ होता।

दबा कर चल रहा हूं दर्द का गहरा दरिया सीने में,

इस दर्द में ज़िक्र किसी ग़ैर का होता तो सुकूँ होता।



  हेमंत चौहान "वत्स"