मेरे पास भी होते आंसू तो मैं भी रो लेता,
अपने गहरे जख्मों को खारे पानी से धो लेता।
सूखे हुए कांच के कटोरों में पानी का रेशा भी नहीं मिलता ,
जब भी टटोलता हूं ज़ख्म हरा-सा है मिलता ।
किसी किस्मत वाले के गालों पर बहते हैं आंसू,
यहाँ तो अंदर ही अंदर दरिया-सा है बहता।
आता नहीं हर किसी को रोने का हुनर,
ये हुनर भी किसी-किसी को है मिलता।
किसी के आंसू से किसी को ठंडक मिलती होगी,
मेरे आंसुओं के बहने से कोई जलता सा है मिलता।
अक्सर लोग बहा देते हैं आंसुओं में बेचैनी,
मेरे आंसू गर बह जाएं, बेचैन - सा है मिलता।
तेरी बेचैनी बहती तो कुछ हल्का तो होगा,
मेरी बेचैनी न बहे तो चैन सा है मिलता।
कीमत ही क्या होगी इस खारे पानी की यारों,
दरिया में हो तो पूछे, समन्दर में कौन पूछता ।
हेमंत चौहान "वत्स "
किसी सितम पर बह जाए तो बेईमानी सी होगी।