Thursday, 23 April 2026

तुम कहां थी अब तक



कई बार खुद से सवाल करता हूं,

तुम मिलती हो - तो , पूछता हूं तुमसे

  अब तक तुम कहां थी !

कैसी अनोखी छवि,

प्रेमातुर कामिनी, मेरे हृदय की अरि,

जाने किस गति में व्योम थी !

दूर रहती हो तो,

हृदय में क्रोध - स्थापित

ढिंग से मोह व्यवस्थित, मन अव्यवस्थित,

रहता है।

अंजान थी!

कभी बहुत खुश , तो 

कभी उदास रहता हूँ।

तुम मिलती हो, तो 

पूछता हूं, मैं

तुमसे क्यों प्यार करता हूं,

कैसा अनोखा गठबंधन,

इतनी बेढ़ंगी, बेपरवाह

अपार सादगी, प्यार अथाह,

हृदय शांत - गोह 

चंचल आंखों से बात करता हूं।

देह को चमकाने में ,

मन को मैला कर रहा

क्या मैं प्रताड़ित कर रहा !

कई बार खुद से 

सवाल करता हूं -

मन का मोल न जानू

नित नए अपराध करता हूं।

सोचता हूं,

कुछ छुपा तो नहीं,

अंधेरे में प्रश्न -

प्रश्न पर प्रश्न करता हूँ।

मुस्कुराती हो होठों से

देखती हो आंखों से

एक सवाल मेरे अंदर भी टटोलती हो

छोड़ती हो - अपना भी आंखों से

नहीं - सब शांत

अतीत बातें करते हैं आपस में,

गहराई में,

तुम्हारी तलाश में भटकी थी -

अब टकराई हूं परछाईं से,

अतीत से ग्लानि से,

तुम्हारे प्रश्न से देह से

मैं फिर सवाल कई बार करता हूं

करता हूं खुद से खुदा से 

अंजान शक्स से ,

ईमान और ईशान से

मेरे जीवन का पूरब,

तुम कहां थी अब तक !

तुम अब तक कहाँ थीं


                                                                                  

डॉ हेमंत चौहान "वत्स"


Wednesday, 8 April 2026

समय और मैं

 समय ने मुझे जन्म दिया,

समय ही मुझे मारेगा 

फिर भी साथ नहीं चलते


समय और मैं।


परिस्थितियों को लाता है,

खींचकर, मुझसे मिलवाता है,

फंसाता है ,रुलाता है,

सुलझाता है,हंसाता है,

कभी वो आगे निकलता है कभी मैं,


साथ साथ नहीं चल पाते,

लड़ते और झगड़ते हैं,

पता नहीं किस राह से जाता है ,

हर बार नई होती है,

कभी मुस्कुराता हूं कभी कोसता हूं मैं,


अब क्या जिक्र करूं,समय की करतूतों का

कभी कभी तो खुद से ही नहीं मिल पाता हूं मैं,

समय से ही समय लेता हूं, खुद से मिलने का,

कुछ समय में ही समय हो जाता है,

और समय मुझे अधूरा छोड़ जाता है।

ये समय भी जाने कहां से आया,

 जाने, कब तक रहेगा।


मेरा समय खराब नहीं होता,

और अच्छा भी नहीं,

आवारा भी नहीं होता और व्यस्त भी नहीं,

मेरा समय भूखा भी नहीं होता ,

ओर अफरा भी नहीं,

मेरा समय मेरा नहीं होता और पराया भी नहीं,

मैं तो बस इसको देखता हूं,

और ये मुझे चलाता है।



डॉ हेमंत चौहान "वत्स"