तुम मिलती हो - तो , पूछता हूं तुमसे
अब तक तुम कहां थी !
कैसी अनोखी छवि,
प्रेमातुर कामिनी, मेरे हृदय की अरि,
जाने किस गति में व्योम थी !
दूर रहती हो तो,
हृदय में क्रोध - स्थापित
ढिंग से मोह व्यवस्थित, मन अव्यवस्थित,
रहता है।
अंजान थी!
कभी बहुत खुश , तो
कभी उदास रहता हूँ।
तुम मिलती हो, तो
पूछता हूं, मैं
तुमसे क्यों प्यार करता हूं,
कैसा अनोखा गठबंधन,
इतनी बेढ़ंगी, बेपरवाह
अपार सादगी, प्यार अथाह,
हृदय शांत - गोह
चंचल आंखों से बात करता हूं।
देह को चमकाने में ,
मन को मैला कर रहा
क्या मैं प्रताड़ित कर रहा !
कई बार खुद से
सवाल करता हूं -
मन का मोल न जानू
नित नए अपराध करता हूं।
सोचता हूं,
कुछ छुपा तो नहीं,
अंधेरे में प्रश्न -
प्रश्न पर प्रश्न करता हूँ।
मुस्कुराती हो होठों से
देखती हो आंखों से
एक सवाल मेरे अंदर भी टटोलती हो
छोड़ती हो - अपना भी आंखों से
नहीं - सब शांत
अतीत बातें करते हैं आपस में,
गहराई में,
तुम्हारी तलाश में भटकी थी -
अब टकराई हूं परछाईं से,
अतीत से ग्लानि से,
तुम्हारे प्रश्न से देह से
मैं फिर सवाल कई बार करता हूं
करता हूं खुद से खुदा से
अंजान शक्स से ,
ईमान और ईशान से
मेरे जीवन का पूरब,
तुम कहां थी अब तक !
तुम अब तक कहाँ थीं
डॉ हेमंत चौहान "वत्स"

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