समय ही मुझे मारेगा
फिर भी साथ नहीं चलते
समय और मैं।
परिस्थितियों को लाता है,
खींचकर, मुझसे मिलवाता है,
फंसाता है ,रुलाता है,
सुलझाता है,हंसाता है,
कभी वो आगे निकलता है कभी मैं,
साथ साथ नहीं चल पाते,
लड़ते और झगड़ते हैं,
पता नहीं किस राह से जाता है ,
हर बार नई होती है,
कभी मुस्कुराता हूं कभी कोसता हूं मैं,
अब क्या जिक्र करूं,समय की करतूतों का
कभी कभी तो खुद से ही नहीं मिल पाता हूं मैं,
समय से ही समय लेता हूं, खुद से मिलने का,
कुछ समय में ही समय हो जाता है,
और समय मुझे अधूरा छोड़ जाता है।
ये समय भी जाने कहां से आया,
जाने, कब तक रहेगा।
मेरा समय खराब नहीं होता,
और अच्छा भी नहीं,
आवारा भी नहीं होता और व्यस्त भी नहीं,
मेरा समय भूखा भी नहीं होता ,
ओर अफरा भी नहीं,
मेरा समय मेरा नहीं होता और पराया भी नहीं,
मैं तो बस इसको देखता हूं,
और ये मुझे चलाता है।
डॉ हेमंत चौहान "वत्स"

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