फूलों पर चल कर ज़ख्म खाए हैं मेरे पैरों ने,
कांटों का ज़िक्र होता तो सुकूँ होता।
अपनों से सिलवा कर लाए हैं दिल के टुकड़ों को,
गैरों का ज़िक्र होता तो सुकूँ होता ।
क्या मालूम था तकदीर मेरे ही लफ़्ज़ लाएगी ज़िंदगी में,
किसी और का कहा होता तो सुकूँ होता।
मिला तो वही जो मांगा था तस्वीर की सीरत में,
इस चांद में दाग़ न होता तो सुकूँ होता।
हर रोज़ अपने ही गरेबां से जार जार लड़ती है तकदीर मेरी,
ये ग़रेबाँ किसी ग़ैर का होता तो सुकूँ होता।
फूलों में चल कर भी हर वक्त हंसते हैं नंगे पैर मेरे,
ये आंसू भी किसी ग़ैर का होता तो सुकूँ होता।
इतनी खामोशी से निकलती हैं आहें लबों से मेरे,
इन आहों में ज़िक्र किसी ग़ैर का होता तो सुकूँ होता।
दबा कर चल रहा हूं दर्द का गहरा दरिया सीने में,
इस दर्द में ज़िक्र किसी ग़ैर का होता तो सुकूँ होता।
हेमंत चौहान "वत्स"

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