Monday, 5 January 2026

नारी - निराकारी


 नर से न कर होड़ नारी,

नर से ही होती है नारी।


नर से हितों बीज पनपता,

इस जग में तेरी है क्यारी,

कितनी भी कोई आग लगाता,

फिर भी है नर ही की प्यारी।


नर से न कर........


नर में जो दिखती है शक्ति, 

वो भी तो एक रूप है नारी,

नारायण की होती भक्ति,

वो भी तो एक रूप है नारी।


नर से न कर...........


जीवन के इस चक्रव्यूह की,

कुंजी भी होती है नारी,

जीवन के हर वन - कानन की,

हर बगिया की तू है फुलवारी।


नर से न कर..........


कितना विकट समय है जग में,

नर - नारी की होड़ है जग में,

जबकि घोर अंधकार से जग में,

इनकी ही पहचान है जग में।


नर से न कर ............


इनकी इन सब होड़ हाड़ में ,

श्रृष्टि के हैं नियम बदलते,

सब प्रलय की बेदी चढ़ते,

ये दोनों ही कारण बनते।



हेमंत चौहान "वत्स "

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